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जन्माष्टमी पर विशेष: ऐसे करें भगवान श्रीकृष्ण की पूजा, पूजा के बाद पढें ये आरती

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जे.पी.चन्द्रा की रिपोर्ट

बिहार नेशन: देश में शुक्रवार यानि 19 अगस्त को श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाने का शुभ संयोग है। भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी का त्योहार पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। हालांकि कुछ हिस्सों में गुरुवार, 18 अगस्त को भी जन्माष्टमी मनाई जा रही है। ऐसी मान्यता है कि भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रात्रि में माता देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। वे देवकी और वासुदेव के आठवें संतान थे।

श्री कृष्ण भगवान् की पूजा ऐसे करें :

जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण को वस्त्र, आभूषण, तिलक, फूल, माला आदि से सजाएं। फिर उनकी पूजा करें और भोग लगाएं। इसके बाद आरती करें। आरती के लिए घी के दीपक का प्रयोग करें। दीप प्रज्ज्वलित करने के बाद नीचे दी गई आरती गाएं। इस दौरान घंटी और शंख बजाते रहें। आरती पूरी होने के बाद दीपक को घर में हर जगह ले जाएं ताकि घर के अंदर की नकारात्मकता दूर हो जाए। जब दीपक ठंडा हो जाए तो इसे एक तरफ रख दें।

वहीं धर्म ग्रंथों के अनुसार कान्हा को दिन में चार बार भोग लगाना चाहिए। माखन, दही, मिश्री, खीर का भोग लगा सकते हैं। जबकि एक बार घर में कान्हा को स्थापित करने के बाद उन्हें कभी अकेला न छोड़े। लंबे समय के लिए कहीं बाहर जा रहे हों तो श्रीकृष्ण को भी साथ ले जाएं। प्राण प्रतिष्ठा के बाद कान्हा की रोजाना पूजा करना बहुत जरूरी है।

भगवान श्रीकृष्ण की आरती

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की,
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला,
श्रवण में कुंडल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली,
लटन में ठाढ़े बनमाली भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक।

चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की, आरती कुंजबिहारी की।

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं,
गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग।

मधुर मिरदंग ग्वालिन संग, अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की, आरती कुंजबिहारी की।

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा,
स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस।

जटा के बीच, हरै अघ कीच, चरन छवि श्रीबनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की, आरती कुंजबिहारी की।

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू,
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू।

हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद,
कटत भव फंद, टेर सुन दीन दुखारी की।

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