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केंद्र कभी भी सदन में ला सकती है कॉमन सिविल कोड, तैयारी पूरी, जानें क्या है समान नागरिक संहिता और क्या है अंतर

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जे.पी.चन्द्रा की रिपोर्ट

बिहार नेशन: केंद्र कॉमन सिविल कोड लाने की तैयारी कर चुकी है। सदन में यह किसी भी समय विधेयक पेश किया जा  सकता है। केंद्र ने इसके लिए तैयारी शुरू कर दी है।  इसके परीक्षण के लिए उत्तराखंड में एक कमिटी का भी गठन कर दिया गया है। लेकिन आपको बता दें कि कमिटी के लिए ड्राफ्ट निर्देश बिंदू केंद्रीय कानून मंत्रालय ने ही दिया है। इससे पता चलता है कि ड्राफ्ट का कानून केंद्र के पास पहले से ही तैयार है।

सरकार के उच्चतर सूत्रों के अनुसार राज्यों में बने नागरिक संहिता के कानूनों को बाद में केंद्रीय कानूनों में समाहित कर दिया जाएगा। क्योंकि एक समानता लाने के लिए कानून का केंद्रीय होना जरूरी है। राज्यों में यह कानून को परीक्षण के तौर पर बनवाया जा रहा है। यह पहला मौका है जब सरकार ने पहली बार इस कानून के लाने के बारे में इतनी स्पष्टता से कहा है। सूत्रों ने कहा कि यह कानून अवश्य आएगा लेकिन कब और किस समय आएगा, यही सवाल है।

कॉमन सिविल कोड

सरकार का इरादा था कि समान नागरिक संहिता पर राष्ट्रीय विधि आयोग से रिपोर्ट ले ली जाए लेकिन विधि आयोग के 2020 में पुनर्गठन होने के बावजूद कार्यशील नहीं होने के कारण राज्य स्तर पर कमेटियां बनाई जा रही हैं। कमेटी का फॉर्मेट विधि आयोग की तरह से ही है। इसमें सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना देसाई, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज प्रमोद कोहली, पूर्व आईएएस शत्रुघ्न सिंह और दून विवि की वीसी सुरेखा डंगवाल शामिल हैं।

यह पूछे जाने पर कि आदिवासियों के लिए इसे कैसे लागू करेंगे, क्योंकि उनके कानून उनकी रीतियों के अनुसार होते हैं। देश में 10 से 12 करोड़ आदिवासी रहते हैं जिनमें से 12 फीसद के आसपास पूर्वोत्तर में रहते हैं। वहीं कानून के आने से संयुक्त हिन्द परिवार को आयकर में मिलने वाली छूट समाप्त हो जाएगी। सूत्रों ने कहा कि हमें एक देश के रूप में आगे बढ़ना है तो थोड़ा एडजस्ट करना होगा।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक आपको बता दें कि यह कमिटी अन्य राज्यों मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में भी बनाई जा सकती है। इन सभी राज्यों ने अपने प्रदेश में कॉमन सिविल कोड को लाने के लिए पहले से ही तैयारी कर रखी है। वहीं इस बारे में केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजीजू ने कहा कि यह कानून जरूर लाया जाएगा। यह प्रमुखता से भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा रहा है। यह कानून हर हाल में लाया जाएगा। आपको यह भी बता दें कि इस कानून के लागू होने से 20 प्रतिशत दिवानी मुकदमे स्वतः समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि सभी पर आईपीसी की धारा एकसमान रूप से लागू होंगे ।

क्या है समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता से देश में सभी नागरिकों के लिए विवाह, विवाह की उम्र, तलाक, पोषणभत्ता, उत्तराधिकार, सह-अभिभावकत्व, बच्चों की कस्टडी, विरासत, परिवारिक संपत्ति का बंटवारा, वसीयत, चैरिटी-दान आदि पर एक समान कानून हो जाएगा चाहे वे किसी भी धर्म या संप्रदाय या मत से हों।

अभी ये कानून हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और पारसियों के लिए अलग अलग हैं जो उनके धार्मिक ग्रंथों पर आधारित हैं। हिन्दुओं का कानून वेद, उपनिषद, स्मृति, न्याय के आधुनिक मत, बराबरी आदि पर आधारित हैं जबकि मुसलमानों का कानून कुरान, सुन्नाह, इज्मा और कियास पर आधारित हैं। इसी प्रकार ईसाइयों का कानून बाइबल, रूढियां, तर्क और अनुभव के आधार पर बने हैं। पारसियों के कानून का आधार उनके धार्मिक ग्रंथ जेंद एवेस्ता और रूढियां हैं।

कुछ अंतर भी है

वहीं पारसी आपसी सहमति से विवाह विच्छेद नहीं कर सकते। संपत्ति के कानून मुसलमानों में पुरुष के हक में झुके हैं जबकि हिन्दुओं में स्त्री को बराबर के हक हैं। मुसलमानों में वसीयत भी एक तिहाई संपत्ति की की जा सकती है वह भी मौखिक। तलाक के बाद मुस्लिम महिला को सीमित समय तक ही गुजारा भत्ता दिया जाता है।

आपको बता दें कि जहाँ मुस्लिम कानून में बहुविवाह की छूट है। । मतलब मुस्लिम अपनी लॉ के मुताबिक चार शादियां कर सकता है जो जायज है। तो वहीं अन्य धर्म में एक पति और पत्नी का नियम दोनों कड़ाई  से लागू किया गया है। अगर बांझपन या नपुंसकता जैसा उचित कारण भी है तो भी हिंदू, ईसाई, पारसी दूसरी विवाह नहीं कर सकते हैं । अगर वे इस कानून का वे उल्लंघन करते हैं तो आईपीसी की धारा 494 के तह्त 7 वर्ष तक की सजा मिल सकती है। इसके साथ ही मुस्लिम में विवाह के लिए कोई उम्र की सीमा तय नहीं की गई है। मुस्लिम अगर 9माह की कन्या से भी शादी करता है तो जायज माना जाएगा । जबकि अन्य धर्मों के लिए उम्र सीमा 21 वर्ष तय की गई है।

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