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औरंगाबाद जिले के नक्सल प्रभावित इलाके में होगी खजूर की व्यवसायिक खेती

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जे.पी.चन्द्रा की रिपोर्ट

बिहार नेशन: अब जिले के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में खजूर की व्यवसायिक खेती की जाएगी।इसके लिए देव प्रखंड के देवा बीघा, मदनपुर प्रखंड के चरैया, पड़रिया, गंजोई और खैरा के 20 किसानों का चयन किया गया है। इन सभी को इसकी खेती की व्यवसायिक जानकारी देने के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें इसके लिए राजस्थान राज्य के जैसलमेर के भोजका स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में भेजा गया है। सोमवार को औरंगाबाद के डीएम सौरभ जोरवाल ने इन्हें रवाना किया। नाबार्ड के द्वारा आरडीएमओ के सहयोग से यह प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बताया गया कि देव क्षेत्र सूखा से प्रभावित है और यहां बंजर भूमि है।

नाबार्ड की पहल पर वर्ष 2008 से 2012 तक तीन सूक्ष्म जल छाजन कार्यक्रम 25 सौ हेक्टेयर भूमि में क्रियान्वित किए गए थे। इसके कारण क्षेत्र की 30 प्रतिशत से ज्यादा बंजर भूमि में खेती संभव हुई और यहां का जलस्तर भी उपर आ गया। पेयजल की समस्या का स्थाई समाधान हो पाया है। जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभाव को कम करने के लिए इस परियोजना का संचालन किया जा रहा है। जलवायु अनुकूल फसल और जैविक खेती की मदद से उत्पादन लागत को कम कर खेती का व्यवसायीकरण करने के लिए यह पहल की गई है।

वहीं बताया गया कि खजूर एक लाभदायक फल है जो लगने के तीसरे साल से लेकर 80 साल तक उपज देता है। प्रति पेड़ 4 से 5 क्विंटल खजूर का उत्पादन होता है जिसकी बाजार में कीमत 10 हजार रुपए से 15 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक है। बारुण प्रखंड के सिरिस में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र ने भी खजूर की खेती को इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त माना है।

बता दें कि इस क्षेत्र में स्थाई जीविका के लिए यह वरदान साबित हो सकता है। इन सभी किसानों जिला कलेक्ट्रेट से रवाना किया गया । इस मौके पर नाबार्ड के डीडीएम सुशील कुमार सिंह, जिला कृषि पदाधिकारी रणवीर कुमार सिंह सहित कई अन्य लोग भी उपस्थित रहे । वहीं इस दौरान जिले के डीएम सौरभ जोरवाल ने भी इसकी सराहना करते हुए कहा कि यह लोगों के लिए एक स्थाई व्यवसाय हो सकता  है।

गौरतलब हो कि खजूर को स्वास्थ के लिए काफी लाभकारी माना जाता है। इसकी उत्पत्ति मूल रूप से अरब और अफ़्रीकी देशों की मानी जाती है। इसके पौधे 15 से 25 मीटर तक भी होते हैं। इसकी खेती से किसानों को काफी अच्छा लाभ होता है।

 

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