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पितृ पक्ष 2021: आज से 16 दिनों तक का पितृ पक्ष शुरू, इसके साथ ही गया में पिंडदान भी शुरू

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जे.पी.चन्द्रा की रिपोर्ट

बिहार नेशन: आज से पितृ पक्ष का आरंभ हो चुका है। इस समय को हिंदू धर्म के पंचाग में खास महत्व माना जाता है। आश्विन अमास्या की तिथि समाप्त होती है । इस पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। यह 16 दिनों तक चलता है। इस समय लोग अपने पितरों को याद करते हैं और पूजते हैं। यह आज यानी 20 सितंबर से यह शुरू हो गया है जिसमें अपने पितरों को लोग पिंडदान करेंगे । इस पिंडदान के द्वारा लोग अपने उन पितरों को याद करते हैं जो अब पृथ्वी पर जीवीत नहीं हैं।

इन दिनों के दौरान हम पितरों का पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध और विशेष पूजा कर्म आदि किए जाते हैं। पितृपक्ष के दौरान पवित्र नदियों में जाकर स्नान करना और पितरों को तर्पण देना, कौए, गाय, ब्राह्राण और श्वान को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष के दिनों में बिहार के गया में पिंडदान और श्राद्धकर्म करने का विशेष महत्व होता है।

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इस दौरान गया में बड़ी संख्या में लोग अपने मृत परिजनों का पिंडदान करने के लिए आते हैं। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। हिंदू धर्म में पितृ यानी हमारे पूर्वज जो अब इस दुनिया में जीवित नहीं हैं उनके प्रति आस्था, सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करना ही पितृ पक्ष कहलाता है। दिवंगत प्रियजनों की आत्माओं की तृप्ति, मुक्ति और श्रद्धा पूर्वक की गई क्रिया का नाम ही श्राद्ध है।

एरकी कला,मुखिया प्रत्याशी
एरकी कला, मुखिया प्रत्याशी

हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा तिथि से लेकर अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक का समय पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहलाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज जो अब इस दुनिया में नहीं हैं वे अपने परिजनों के पास मुक्ति और भोजन प्राप्त करने के लिए उनसे मिलने आते हैं। इस कारण से पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है।

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ऐसे व्यक्ति जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए भाद्रपद महीने के पितृपक्ष में उनको तर्पण दिया जाता है। पितर पक्ष समाप्त होते ही परिजनों को आशीर्वाद देते हुए पितरगण वापस मृत्युलोक चले जाते हैं।

ज्योतिषशास्त्र के नजरिए से अगर देखा जाए तो जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं तब ही पितृ पक्ष आरंभ होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इस अवधि में सूर्य कन्या राशि पर गोचर करता है। इसलिए इसे कनागत भी कहते हैं। वहीं जिनकी मृत्यु तिथि मालूम नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है। इसे सर्वपितृ अमावस या सर्वपितृ श्राद्ध भी कहते हैं। यह एक श्रद्धा पर्व है। इस बहाने अपने पूर्वजों को याद करने का एक रास्ता।

रेशमी देवी,मनिका (मुखिया प्रत्याशी)

पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए और उन्हें भोजन से तृप्ति के लिए कौए, गाय और कुत्ते को भोजन दिया जाता है। पितृ पक्ष में यम बलि और श्ववान बलि देने का विधान होता है। यम बलि में कौए को और श्वान बलि कुत्ते को भोजन के रूप में दिया जाता है। कौआ और श्वान दोनों ही यमराज के संदेश वाहक हैं। इसके अलावा गाय में सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है इसलिए गाय का महत्व है।

वहीं पितर पक्ष में श्वान और कौए पितर का रूप होते हैं इसलिए उन्हें ग्रास देने का विधान है। पितृपक्ष में इनका खास ध्यान रखने की परंपरा है। अन्य मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में पितरदेव गाय, कौए और श्वान के रूप में अपने प्रियजनों के पास भोजन ग्रहण करने आते हैं। इस कारण से भी इन तीनों का महत्व होता है।

पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान का सबसे ज्यादा महत्व होता है। पिंडदान और श्राद्ध पूजा के लिए गया की धरती को श्रेष्ठ और शुभ माना गया है। शास्त्रों में गया को विशेष महत्व दिया गया है। गया की भूमि को पांचवां धाम भी कहा जाता है।
ऐसी मान्यता है कि गया में पिंडदान और श्राद्ध पूजा करने से पितरों का मुक्ति मिल जाती है।

गया भारत के बिहार राज्य में स्थित हैं। भगवान विष्णु ने इसी जगह पर गयासुर नाम के राक्षस का वध किया था जिसके कारण इसका नाम गया पड़ा। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु के चरण गया में उपस्थित हैं।गया जो फल्गु नामक नदी पर स्थित है, त्रेता युग में भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था। तभी से इस स्थान महत्व है। दूर-दूर से लोग यहां पर आकर पूजा पाठ करते हैं तथा अपने पितरों का पिंडदान करते हैं।

वहीं गया में पितृपक्ष के दौरान  श्रद्धालु एक दिन, तीन दिन, सात दिन, पंद्रह दिन और 17 दिन का कर्मकांड करते हैं। अग्नि जल और अन्न के माध्यम से गया में श्राद्ध पूजा करने पर हमारे पितरों तक पहुँचाकर उन्हें तृप्ति किया जाता है। जबकि इस श्राद्ध कार्य या पिंडदान में चावल का विशेष महत्व होता है।

हिंदू धर्म में चावल को एक शुद्धता के साथ-साथ शुभ रूप में माना जाता है। चावल को हिंदू में अक्षत भी कहा जाता है। इसका शादी विवाह मे भी खास महत्व है। इसलिए पितरों को शांति मिले लोग पिंड चावल के आटे से बनाते हैं । ऐसा श्रद्धालुओं का मानना है की इससे लोग अपने पितरों को अधिक संतुष्ट कर पाते हैं ।

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